Monday, January 7, 2019

10% सर्वण आरक्षण: राजनीतिक बेचैनी का ये लक्षण ही लगता है- नज़रिया

नरेंद्र मोदी की सरकार का सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला अगामी लोकसभा चुनाव में कामयाबी हासिल करने के इरादे से तो लिया गया है लेकिन इसके नतीजे उल्टे भी हो सकते हैं.

11 दिसंबर को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में हार के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में जीत हासिल करने के लिए वोट बैंक का नए सिरे से पुख्ता जुगाड़ करने के लिए बाध्य कर दिया है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को देश की आबादी के लगभग 11.5 प्रतिशत सवर्ण तबके का एकजुट समर्थन मिला था.

लेकिन पिछले साढ़े चार वर्षों के दौरान विभिन्न वजहों से सवर्ण मतदाताओं का आधार भारतीय जनता पार्टी से छिटका है.

सुप्रीम कोर्ट के दलित एक्ट के खिलाफ फैसले ने भारतीय जनता पार्टी को बड़ी दुविधा में डाल दिया था.

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ दो अप्रैल 2018 को जब बहुजन संगठनों ने अप्रत्याशित देशव्यापी आंदोलन किया तो नरेंद्र मोदी की सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ संसद में संविधान संशोधन लाना पड़ा.

दूसरी तरफ़, सवर्णों के जातिगत संगठनों ने नरेंद्र मोदी की सरकार के संविधान संशोधन का विरोध किया और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को हराने का ऐलान किया.

भारतीय जनता पार्टी आरक्षण के सिद्धांत के विरोध में रही है.

बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जब बहुजनों के आरक्षण के संवैधानिक सिद्धांत की समीक्षा करने पर जोर दिया था तो नतीजे के तौर पर बिहार में भारतीय जनता पार्टी को बहुजन मतों से हाथ धोना पड़ा था.

तब से भारतीय जनता पार्टी बहुजनों के लिए आरक्षण का विरोध करने के बजाय बहुजनों के आरक्षण को कई हिस्सों में बांटने की कोशिश में लगी हुई है.

पिछड़े वर्ग के आरक्षण को कई हिस्सों में बांटने के लिए पूर्व न्यायाधीश जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में लगा है.

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार भी पिछड़े वर्गों के आरक्षण को कई हिस्सों में बांटने के प्रयास में लगी है.

लेकिन दूसरी तरफ़, भारतीय जनता पार्टी उन जातियों को आरक्षण देने के धड़ाधड़ फैसले कर रही है जो संविघान के मुताबिक आरक्षण के हकदार नहीं हो सकते हैं.

इनमें महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का उदाहरण सबसे ताज़ा है. संविधान में शैक्षणिक और सामांजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर देने का प्रावधान है.

लेकिन 1978 में देश के विभिन्न राज्यों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के विरोध में होने वाले आंदोलनों से निपटने के लिए आर्थक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने की मांग की जाती रही है.

उस दौरान जनसंघ ने, जिस नाम से भारतीय जनता पार्टी पहले जानी जाती थी, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चुनी गई सरकारें गिराने में अहम भूमिका अदा की थी.

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