Monday, March 25, 2019

दक्षिण की ‘अयोध्या’: सांप्रदायिकता यहां छिपी है, चुनाव में निकलती है

अमित कुमार निरंजन, कोयम्बटूर (तमिलनाडु). दोपहर ढाई बजे के करीब 40 डिग्री के तापमान में सड़कों के साथ-साथ राजनीति पार्टियों के कार्यालय भी लगभग सूने पड़े थे। एआईएडीएमके के ऑफिस में एक कार्यकर्ता एम स्वामी ने बताया- बड़े नेता टिकट के लिए दिल्ली और चेन्नई में कई दिनों से डेरा जमाए हुए हैं। चुनाव का मिजाज भांपने के लिए मैंने बात आगे बढ़ाई लेकिन कुछ बताने के पहले उसने मुझसे पूछा कि आप मुस्लिम हैं या हिन्दू। (कुछ क्षण रुक) मैंने जवाब दिया उत्तर भारत का हिन्दू। उसके माथे की लकीरें थोड़ी नरम पड़ीं। लेकिन मंदिर-मस्जिद से हजारों किमी दूर ऐसे सवाल ने मुझे चौंका दिया...मैंने सवाल की वजह पूछ ही ली। बातचीत में पता चला यहां 1998 में हुए सीरियल ब्लास्ट ने करीब 60 जानें ही नहीं ली थीं...बल्कि भरोसे की भी हत्या कर दी थी। स्वामी हंसते हुए बोला...आप दाढ़ी से हिन्दू नहीं लगते।

बहरहाल, यहां से मैंने भाजपा दफ्तर की ओर रवानगी ली। यहां हथियारबंद पुलिसकर्मी दिखे। स्टाफ ने बताया कि यहां सुरक्षा की हर दिन की रिपोर्ट दिल्ली जाती है। 21 साल पहले 14 फरवरी के दिन आडवाणी की सभा से ठीक पहले यहां धमाके हुए थे। लोगों के दिमाग में उस घटना की दर्दनाक यादें अब भी बसी हुई हैं। हालांकि, सांप्रदायिकता को तमिलनाडु ने कभी मौका नहीं दिया। इसके बावजूद  दो साल पहले इस मुद्दे को दोबारा उभारने की कोशिश की गई थी। तब हिन्दू मुंनड़ी संगठन के नेता शशि कुमार की हत्या कर दी गई थी, काेयम्बटूर बंद हो गया था। यही वजह है कोयम्बूटर में एआईएडीएमके ने भाजपा को यह सीट दी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस सीट का असर कोयम्बूटर के साथ-साथ तिरुपुर, डिंडीगल, पोलाची, मदुरई, शिवगंगा, रामनाथपुरम और थेनी सीट पर भी दिख सकता है। हालांकि कोयम्बटूर से सटे नीलगिरिस और इरोड में कामगारों के मुद्दे ज्यादा प्रभावी हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञ सत्यमूर्थी कहते हैं भाजपा ने जैसे अयोध्या को धर्म की राजनीति का केन्द्र बना दिया, वैसा ही कोयम्बटूर में करे तो हैरत नहीं होगी। कोयम्बटूर में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य करुप्पू सामी ने बताया कि हिन्दू मुंनड़ी का असर कोयम्बटूर और इसके आसपास सात से आठ सीटों पर है। 1998 के ब्लास्ट के बाद से ये संगठन बहुत ज्यादा बड़ा हो गया है। हालांकि पूरे कोयम्बटूर में सिर्फ 10-15% ही अल्पसंख्यक हैं। भाजपा के जिलाध्यक्ष  सी आर नंदा कुमार भी इस बात काे स्वीकारते हैं सात-आठ सीटों पर हिन्दूवादी संगठन हिन्दू मुंदड़ी बहुत मजबूत है और इन लोकसभा क्षेत्रों में सांप्रदायिकता मुद्दा अंडर करंट है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ और सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी।

उधर, कोयम्बटूर के ऊपरी हिस्से में नीलगिरिस लोकसभा क्षेत्र है। यहां चाय की पत्ती का सही दाम न मिलना बड़ा मुद्दा रहा है। यहां 40% परिवार चाय के धंधे से जुड़े हैं। एंटीइंकम्बेंसी एआईएडीएमके को नुकसान दे सकती है। उधर, इरोड सीट का पूरा क्षेत्र उद्योगों पर आधारित है। करीब 50 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े उ‌‌द्योग हैं। नोटबंदी और जीएसटी के बाद करीब 70% उद्योगों पर इसका सीधा असर पड़ा है। यह भाजपा-एआईएडीएमके को नुकसान पहुंचा सकता है। वक्त पर सैलरी न मिलना, और कुछ छोटे उद्योगों के बंद होने के का मुद्दा एआईएडीएमके और भाजपा गठबंधन के लिए दिक्कत दे सकता है। इन दोनों ही जगहों से एआईएडीमके अपने उम्मीदवार उतार रही है।

चुनावी गणित : अभी सारी सीटें अम्मा की पार्टी के पास

गठबंधन: अकेले नहीं उतरेगी भाजपा-कांग्रेस

कोयम्बटूर, रामनाथ पुरम, शिवगंगा में भाजपा, बाकी सीटों पर एआईएडीएमके उतरेगी। कांग्रेस का डीएमके व अन्य दलों के साथ अलायंस है। नीलगिरीस, डिंडीगल, पोलाची पर डीएमके लड़ेगी। काेयम्बटूर और मदुरई में सीपीआई (एम), इरोड में एमडीएमके लड़ेगी। कांग्रेस को शिवगंगा और थेनी सीट मिली है। आईयूएमएल रामनाथपुरम और सीपीआई तिरुपुर में उतरेगी।

मुद्दे : तमिलनाडु में हिंदुत्व फैक्टर
यूं तो तमिलनाडु में सांप्रदायिकता मुद्दा नहीं है। लेकिन हिन्दू मुड़नी संगठन की वजह से कोयम्बटूर, तिरुपुर, डिंडीगल, थेनी, मदुरई, रामनाथ पुरम, शिवगंगा, पुडुकोटि सीटों पर सांप्रदायिकता के मुद्दे का अंडर करंट है। कोयम्बटूर तमिलनाडु का अकेला ऐसा क्षेत्र जहां पुलवामा और एयर स्ट्राइक का सबसे ज्यादा असर है।

जाति :  कोंडर और नायडू वोट निर्णायक
इरोड और नीलगिरीस को छोड़कर अन्य आठ सीटों पर अल्पसंख्यक वोट संख्या की औसत संख्या करीब 10 से 15 फीसदी है। वहीं कोंडर और नायडू जाति के कुल वोटर करीब 45% है। माना जाता है कि यह परंपरागत वोट है जो एमजीआर से काफी प्रभावित रहा है। इस वजह से एआईएडीएमके की स्थिति कुछ मजबूत नजर आती है।

2014 की स्थिति... भाजपा-कांग्रेस कहीं नहीं थीं
सीट: कोयम्बटूर, नीलगिरीस, इरोड, तिरुपुर, डिंडीगल, थेनी, मदुरई और रामनाथपुरम्, शिवगंगा, पोलाची।

एआईएडीएमके के पास थीं सारी सीटें।

स्टालिन की परीक्षा : जयललिता और करुणानिधि दोनों अब दुनिया में नहीं हैं। फिर भी समर्थक इन्हें पूज रहे हैं। पारदर्शी शर्ट की जेब में नेता का फोटो रखने का फैशन इसी से उपजा है। एआईएडीएमके बिना चेहरे के मैदान में है। वहीं डीएमके के स्टालिन की इस बार बड़ी परीक्षा है।

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