Monday, October 29, 2018

पिंजरे से दो तोते उड़ने का लंका-कांड - कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

हाथ में खुले दरवाजे का पिंजरा उठाए हाजी बाहर लॉन के पेड़ों में सुबह-सुबह दिखे तो समझ में आ गया कि कुछ नया शिगूफा ढूंढ़ लाए हैं और अब मेरा इतवार जहर होने की कगार पर है! मैंने चाय का कप लिए उनकी और बढ़ते हुए पुकारा ‘अमां हाजी, दशहरा तो बीत गया।

अब क्या दिवाली के लिए नीलकंठ ढूंढ़ रहे हो?’ पेड़ों के झुरमुट से बाहर झांककर हाज़ी गुर्राए,’ अबे दिवाली छोड़ो महाकवि, हमारी सत्ता के पिंजरे से दो तोते उड़ गए, उसी का लंका-कांड हुआ पड़ा है, साहेब बेचारे कब तक नीलकंठ बनकर राहुल बाबा की बोतल से जहर पियें भला?

‘मैंने कहा,‘देखो हाजी, रायता तो साहेब और साहेब के जोड़ीदार का ही फैलाया हुआ है, तो अब समेटेगा सुप्रीम कोर्ट थोड़ी ही!’ हाज़ी ने लॉन में पसरते हुए कहा, ‘अजी हां, भूल गए जब तुम और तुम्हारा लम्पट-यार रामलीला के मंच से चिल्लाते थे कि ये कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन है?

जब आदत इन्होंने डाली थी तो दूसरा मौज भी न ले?’ मैंने कहा, ‘हाजी, दोनों बारी-बारी मौज लेते रहे और पूरी दुनिया में हमारा मज़ाक बनता रहे कि सीबीआई ने सीबीआई के खिलाफ सीबीआई में रिपोर्ट करी, सीबीआई ने सीबीआई में छापा मारकर सीबीआई को गिरफ्तार किया!’ हाजी भड़के ‘तो क्या करे देश?

तुम्हारे वाले को तो बस एक हल्दी की गांठ ही दी थी दिल्ली की, उसने तो साढ़ू-सालों चमचों और गुप्तदान करने वाले कांग्रेसियों को ही सत्ता का चूरन बांट दिया। तो अब तो बस ये दो ही बचे बारी-बारी से लूटने के लिए! भाई अब कोई साधु भेष वाला नया डकैत क्यों पैदा करे देश?’

मैंने बात बदली, ‘हाजी, पर इस ‘तोता-फजीती’ से राजस्थान और मध्य प्रदेश का पेड़ तो हिल गया लगता है?’ हाजी ने लंबी सांस लेकर कहा ‘राजस्थान तो भाई लोग खुद भी कह रहे हैं कि ‘गयो राणीरो राज’ पर मध्य प्रदेश में भी बात निकल आई है कि ‘मामा का मामू’ न बना दे जनता।’ मैंने विचार पेला, ‘लोहियाजी कहते थे हाजी कि लोकतंत्र की रोटी अलटती-पलटती रहनी चहिए नहीं तो जल-भुन जाती है।’

हाज़ी ने ठहाका मारा, ‘लग तो रहा है कविराज कि जनता ने स्वाद बदलने का मन बनाया है, पर हमारा तुम्हारा क्या? वही महंगाई-चोरी-चकारी और नंगी लूट।’ मैंने कहा,‘हाजी, राहुलजी बेचारे दम तो पूरा लगा रहे हैं, अब देखो सीबीआई वाले प्रदर्शन में बेचारे पहले ट्रक पर चढ़े, फिर कार्यकर्ताओं के कंधों पर चढ़े, फिर गाड़ी पर चढ़े, मतलब मेहनत तो पूरी की।’

हाजी ने आंख मारी, ‘हां कविराज! ट्रक, कार पर चढ़े, घोड़ी पर और चढ़ जाए तो गंतव्य तक भी पहुंच जाएगा तुम्हारा युवराज। ख़ैर, ये बताओ यार ये साहेब के सरकारी पिंजरे वाले ये दोनों आज्ञाकारी तोते आपस में लड़ क्यों मरे?’ मैंने कहा, ‘ज्यादा तो पता नहीं हाजी, पर सत्ता के कॉरिडोर में अफ़वाह है कि गुजरात से आया तोता साहेब का पुराना-पक्का मिट्‌ठू तोता था और बड़ा तोता उसे साहेब वाली टारगेटेड धुन बजाने नहीं दे रहा था, बस इसी बात पर आपस में चोंचें लड़ गईं!’ हाज़ी बोले, ‘हो सकता है यही हुआ हो पर इन साहेबवादी और कम-साहेबवादी तोतों के चक्कर में कई चोर देश का माल समेटकर जो निकल लिए उसका क्या? उन मुद्‌दों को कौन उठाएगा?’

मैंने कहा ‘दोष तो हम सबका है हाजी, मुद्‌दों के नाम पर जब हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, अगड़े-पिछड़े, गाय-गोबर-पाकिस्तान सुन-पढ़कर वोट देंगे तो बदले में नेता भी तो ऐसे ही फ़र्ज़ी मुद्‌दे उठा-उठाकर लाएंगे न? असली मुद्‌दे उठाओगे या राजनीति में नैतिक रहने की कहोगे तो पराए छोड़ो, अपने ही निर्मम हत्या कर देंगे, अपयश कर देंगे स्कीम में।’ हाजी ने खींसें निपोरी, ‘हा..हा, सही बात महाकवि, सच बोलने पर अपने कैसे हत्या करते हैं इस पर तो तुम्हारी बात मानी ही जानी चाहिए! चलो चलते-चलते अपना ही एक शेर हमसे सुनो-

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