中新网5月23日电 日前,由快手公司和内蒙古公安厅交通管理局联合举办的“快手见政K沙龙——内蒙古交警系统专场”在北京举行。中国警察网、北京市公安交通管理局、清博大数据的新媒体传播权威专家,与来自内蒙古交警系统的50余名代表,齐聚快手总部,共同探索政务新媒体传播的奥妙。
“旅途辗转,安全防范,机票退改,谨防诈骗,不明链接,切勿点击,陌生账户,心底有数……”2018年春节期间,中国警察网在快手发布的一首由网络神曲《生僻字》改编的春运安全知识普及歌曲视频,彻底火了。这条视频播放量超过4700万,点赞近400万次。
值得一提的是,这条视频是中国警察网在快手账号的首条视频。而这条视频的火爆,也为负责该账号运营的中国警察网移动新闻中心副主任徐琦提供了新的政务传播启示。在此次快手见政K沙龙中,他总结道,短视频在众多传播渠道中的重要性日益凸显,在助推重大活动、树立媒体形象、传递价值导向等方面,都能起到相当大的正向激励的作用,同时也提出了全新的课题。他将“中国警察网”账号在快手平台的成功运营经验总结为:“借、变、快、玩”四字诀,“政务新媒体传播尤其需要注意避免自娱自乐,如何让内容出圈是始终需要去思考的问题。”
北京市公安交通管理局新闻办公室主任刘海啸则分享了在新媒体特有的语境与传播节奏下,交管舆情处置的有效新机制。为了应对公安交管舆情数量大、话题多、风险高的特点,他提出交警应该努力适应在融媒体环境中执法,同时利用快手短视频平台等多种新媒体渠道,扩大正面宣传效果,把握“理性、平和、适度”的原则,满足公众更多元的诉求。
此次派出50余名一线新媒体运营人员参与沙龙的内蒙古交管系统,已在全网平台建立起了四级新媒体矩阵,年发布内容量达到2000多万条,总阅读量突破了10亿。内蒙古公安厅交通管理局新媒体中心负责人张瑞表示,通过矩阵去做新媒体,“集团作战”优势更大,与快手公司共同举办的此次沙龙,正是要为全系统培养更多的短视频传播人才,让内蒙古交管系统快手号矩阵,发展成为全国政务新媒体的标杆。
清博大数据副总裁张丹峰从专业的角度指出,新媒体运营应该由数据驱动。不同平台有不同的生态圈,每个用户群体有独特的兴趣图谱,想要打造出一个有网络影响力的政务新媒体账号,不应该局限自己,满足了用户不同的内容消费喜好,才能够让用户沉淀在你输送的价值观里,把流量变成能产生转换力的粉丝,“在媒体运营的过程中,除了对核心内容输出,我们更需要注意的就是数据的利用,挖掘数据背后的意义,从而服务于政务新媒体更加广泛的传播。”
精致=爆款?快手say NO
“大家稍加留心就会发现,在快手上火起来的视频内容并不是最精致、拍摄成本最昂贵的,而是那些最走心的、最真诚的、强烈的表达。”快手公司政务运营总监刘畅为大家解码平台热门内容的特点。她分析说,快手通过“内容”和“人”双重连接用户,让用户选择自己想看的内容,更注重“人”和“社交”,不强推爆款内容,保持平台的多元,鼓励每个人展示自己的故事。账号想“一夜成名”很难,但可以了解流量分发机制,有针对性地提升作品的点赞、评论、播放完成度等指标,力求形成持续正向反馈,从而获得更大的流量分发。
在沙龙的短视频菁英训练营的实操课程环节,快手公司政务策划总监周亚梅从内容策划、内容取材、短视频内容拍摄与剪辑的技巧等几个方面,详细地介绍了运用手机进行短视频制作的技巧,分享了视频后期处理app的强大而实用的功能。周亚梅介绍说:“智能手机硬件设备的进化日新月异,在人工智能与移动互联网技术的加持下,如今用手机客户端制作、发布一条短视频的便捷程度超乎想象,大大降低短视频内容生产的门槛。”她演示的一项通过语音识别,准确生成特效动画字幕的功能,让学员们纷纷感叹“黑科技”。“这些新技术和新玩法真是让人脑洞大开,先用起来的人会享受到更多的红利,”内蒙古交管系统的学员们表示非常受启发,“思路更多了,对实际工作帮助很大。自己摸索不如有人一起交流,有种豁然开朗的感觉。”
据了解,“快手见政K沙龙”是由快手公司倾力打造的线下政务传播主题交流平台,主要包括主题分享、短视频菁英训练营、互动交流等板块。去年以来,快手联合政法、公安、妇联、法院、军队、共青团、国资等各系统,陆续展开了30余场定制沙龙与培训,获得了各方的热烈反响。
据快手公司副总编辑、政务高级总监张鹏介绍,K象征“快”,沙龙致力于通过业内权威专家的经验分享,创造出捷径,帮助政务号更快速地取得宣传工作新突破;同时,K也代表“钥匙”,“那些关键的知识点、创新的想法就像钥匙,我们希望能交到更多人手上。接下来我们会继续积极与平台上的各个政务系统合作开展K沙龙活动,一同开启政务短视频传播的光明未来。”
Friday, May 24, 2019
Wednesday, May 8, 2019
李克强签署国务院令 公布《重大行政决策程序暂行条例》
新华社北京5月8日电 日前,国务院总理李克强签署国务院令,公布《重大行政决策程序暂行条例》(以下简称《条例》),自2019年9月1日起施行。
党中央、国务院高度重视科学民主依法决策。规范重大行政决策程序,是建设法治国家、法治政府的必然要求,是完善中国特色社会主义法治体系、推进国家治理体系和治理能力现代化的重要举措。为进一步推进行政决策科学化、民主化、法治化,提高重大行政决策的质量和效率,《条例》坚持将党的领导贯彻到重大行政决策全过程,对重大行政决策事项范围、重大行政决策的作出和调整程序、重大行政决策责任追究等方面作出了具体规定,主要内容包括:
一是明确了重大行政决策事项范围。《条例》明确了制定重大公共政策措施、实施重大公共建设项目等五方面重大行政决策事项范围,允许决策机关结合职责权限和本地实际确定决策事项目录、标准,经同级党委同意后向社会公布,并根据实际情况调整。
二是细化了重大行政决策的作出程序。《条例》明确了公众参与、专家论证、风险评估程序的适用情形及具体要求,如规定除依法不予公开的决策事项外,应当充分听取公众意见;专业性、技术性较强的决策事项应当组织专家论证;决策实施可能对社会稳定、公共安全等方面造成不利影响的,应当组织风险评估。《条例》明确合法性审查、集体讨论决定为必经程序,还对重大行政决策的启动、公布等作了具体规定。
三是规范了重大行政决策的调整程序。《条例》规定,依法作出的重大行政决策,未经法定程序不得随意变更或者停止执行,需要作出重大调整的,应当履行相关法定程序。
四是完善了重大行政决策责任追究制度。《条例》规定决策机关应当建立重大行政决策过程记录和材料归档制度,对决策机关违反规定造成决策严重失误,或者依法应当及时作出决策而久拖不决,造成重大损失、恶劣影响的,倒查责任并实行终身责任追究。
党中央、国务院高度重视科学民主依法决策。规范重大行政决策程序,是建设法治国家、法治政府的必然要求,是完善中国特色社会主义法治体系、推进国家治理体系和治理能力现代化的重要举措。为进一步推进行政决策科学化、民主化、法治化,提高重大行政决策的质量和效率,《条例》坚持将党的领导贯彻到重大行政决策全过程,对重大行政决策事项范围、重大行政决策的作出和调整程序、重大行政决策责任追究等方面作出了具体规定,主要内容包括:
一是明确了重大行政决策事项范围。《条例》明确了制定重大公共政策措施、实施重大公共建设项目等五方面重大行政决策事项范围,允许决策机关结合职责权限和本地实际确定决策事项目录、标准,经同级党委同意后向社会公布,并根据实际情况调整。
二是细化了重大行政决策的作出程序。《条例》明确了公众参与、专家论证、风险评估程序的适用情形及具体要求,如规定除依法不予公开的决策事项外,应当充分听取公众意见;专业性、技术性较强的决策事项应当组织专家论证;决策实施可能对社会稳定、公共安全等方面造成不利影响的,应当组织风险评估。《条例》明确合法性审查、集体讨论决定为必经程序,还对重大行政决策的启动、公布等作了具体规定。
三是规范了重大行政决策的调整程序。《条例》规定,依法作出的重大行政决策,未经法定程序不得随意变更或者停止执行,需要作出重大调整的,应当履行相关法定程序。
四是完善了重大行政决策责任追究制度。《条例》规定决策机关应当建立重大行政决策过程记录和材料归档制度,对决策机关违反规定造成决策严重失误,或者依法应当及时作出决策而久拖不决,造成重大损失、恶劣影响的,倒查责任并实行终身责任追究。
Thursday, May 2, 2019
मसूद अज़हर के मसले पर चीन नरम क्यों पड़ा?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बुधवार को पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख अज़हर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया.
ये मुमकिन हो सका क्योंकि पाकिस्तान के सबसे बड़े समर्थक और इस मामले में हर बार वीटो लगा देने वाले चीन ने अपने रुख़ में बदलाव किया.
इससे पहले जब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने पर चर्चा हुई, तो चीन ने अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर ऐसा होने से रोक दिया.
क़रीब 10 साल से चीन का यही रुख़ रहा है. इस दौरान उसने हमेशा यही कहा कि इस मामले में जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए; और ऐसे फैसले तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब वक़्त और सब्र के साथ काम लिया जाए और सभी सदस्यों में सहमति बने.
भारत ने मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सबसे पहले 2009 में मुंबई में हुए 26/11 हमलों के बाद रखा था.
सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखने वाले स्थाई सदस्य अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी बाद में इस तरह का प्रस्ताव लाया जबकि एक और स्थाई सदस्य रूस अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रस्ताव का समर्थन करने का वादा करता रहा है.
चीन को अकेला छोड़ते हुए सुरक्षा परिषद के अस्थाई स्दस्यों में से भी ज़्यादातर इस प्रस्ताव के समर्थन में आ गए थे. चीन की इस बात के लिए निंदा होने लगी कि वो पाकिस्तान स्थित इस चरमपंथी का समर्थन कर रहा है जिसका ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी ख़राब रहा है.
लेकिन जब सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध कमेटी मसूद अज़हर के मामले में आम राय नहीं बना सकी तब फ़्रांस ने इस मामले में अगुवाई करते हुए ख़ुद ही मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया. इससे चीन और अलग-थलग पड़ गया.
भारत में इसी साल फ़रवरी में पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले के बाद फ़्रांस, ब्रिटेन और अमरीका ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध कमेटी की मार्च में हुई बैठक में ये प्रस्ताव फिर से रखा. लेकिन चीन ने आख़िरी समय पर एक बार फिर इसपर 'तकनीकी रोक' लगा दी और ये मुद्दा एक बार फिर छह महीने के लिए ठंडे बस्ते में चला गया.
ये चौथी बार था जब चीन ने 'तकनीकी रोक' लगाई थी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति से इस मसले पर और चर्चा करने के लिए कहा था.
लेकिन इसके कुछ ही दिनों के बाद चीन के विदेश मंत्री और भारत में उनके राजदूत इस मुद्दे का जल्द समाधान निकालने की बात करने लगे और छह हफ़्ते के अंदर ही चीन ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी.
इसकी एक वजह ये हो सकती है कि चीन की ओर से बार-बार लगाई जा रही इस तकनीकी रोक को देखते हुए ट्रंप प्रशासन (जिसका चीन के साथ पहले से व्यापार युद्ध चल रहा है) ने पिछले महीने सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर बहस करने का प्रस्ताव दिया था. अमरीका ने कहा था कि ये बहस सुरक्षा परिषद के टेबल पर होनी चाहिए.
अमरीका के इस प्रस्ताव ने चीन को परेशानी में डाल दिया क्योंकि अब चीन को अपना रवैया सार्वजनिक रूप से रखना पड़ता. इससे पहले वो प्रतिबंध समिति की बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में अपनी बात रखता था जिससे ये पता नहीं चल पाता था कि इस मामले में चीन दरअसल क्या कहता था.
इस तरह का दबाव बनता देख पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने ये प्रचार करना शुरू कर दिया कि मसूद अज़हर बहुत बीमार हैं और जबतक उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, तबतक उन्हें कोर्ट में घसीटा नहीं जाना चाहिए.
इसने चीन और पाकिस्तान (ख़ासकर वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई और सेना) को ये सोचने पर भी मजबूर किया होगा कि क्या मसूद अज़हर अब उनके किसी काम के नहीं रहे और क्या वो भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाले हथकंडे के बजाए एक बोझ बन गए हैं.
ये भी दिलचस्प है कि चीन ने ये फ़ैसला ऐसे वक़्त पर किया जब एक दिन पहले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चीन की बेल्ट एंड रोड समिट में हिस्सा लेकर बीजिंग से लौटे थे.
इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत चीन के कई नेताओं से मुलाक़ता की थी. ज़ाहिर है इस दौरान मसूद अज़हर पर भी निश्चित तौर पर बातचीत हुई होगी.
हालांकि चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अपना फैसला तो बता दिया, लेकिन पाकिस्तान को कम से कम नुक़सान हो, इसके लिए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसकी कोई समयसीमा नहीं बताई और अपनी पार्टी लाइन को दोहराते हुए कहा कि जल्द से जल्द इस मसले का उचित समाधान निकाला जाना चाहिए.
चीन की परेशानी को और बढ़ाते हुए पेरिस स्थित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफ़एटीएफ़) ने पिछले एक साल में पाकिस्तान पर नकेल कसते हुए उसे अपनी 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया और उसे जून तक 'काली सूची' में डालने की भी चेतावनी दी. अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वो अपनी धरती पर विभिन्न चरमपंथी संगठनों की आर्थिक फंडिग रोकने में नाकाम रहा है.
चीन फिलहाल एफ़एटीएफ़ का उपाध्यक्ष है और अक्तूबर में अध्यक्ष बनने वाला है. चीन ने अपने फ़ैसले में इस बात का भी ध्यान रखा होगा.
इसके अलावा भारत की हाल में की गई राजनयिक कोशिशें, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आतंकवाद-विरोधी अभियान को भी सराहने की ज़रूरत है, जिसके तहत मोदी चीन समेत सभी महाशक्तियों से सक्रिय द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत के दौरान इस मुद्दे को पुरज़ोर तरीक़े से उठाते रहे हैं.
ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि पिछले अप्रैल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वूहान इनफ़ॉर्मल समिट के दौरान हुई मुलाक़ात में ही इस बात पर सैद्धांतिक तौर पर सहमति बना ली गई थी.
चीन की घोषणा की टाइमिंग से ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरफ़ से मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने का फ़ायदा भारत में हो रहे आम चुनाव में ले सकती है. वो इसे चीन और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी विदेश नीति की बड़ी जीत के तौर पर पेश कर सकती है.
ये मुमकिन हो सका क्योंकि पाकिस्तान के सबसे बड़े समर्थक और इस मामले में हर बार वीटो लगा देने वाले चीन ने अपने रुख़ में बदलाव किया.
इससे पहले जब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने पर चर्चा हुई, तो चीन ने अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर ऐसा होने से रोक दिया.
क़रीब 10 साल से चीन का यही रुख़ रहा है. इस दौरान उसने हमेशा यही कहा कि इस मामले में जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए; और ऐसे फैसले तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब वक़्त और सब्र के साथ काम लिया जाए और सभी सदस्यों में सहमति बने.
भारत ने मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सबसे पहले 2009 में मुंबई में हुए 26/11 हमलों के बाद रखा था.
सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखने वाले स्थाई सदस्य अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी बाद में इस तरह का प्रस्ताव लाया जबकि एक और स्थाई सदस्य रूस अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रस्ताव का समर्थन करने का वादा करता रहा है.
चीन को अकेला छोड़ते हुए सुरक्षा परिषद के अस्थाई स्दस्यों में से भी ज़्यादातर इस प्रस्ताव के समर्थन में आ गए थे. चीन की इस बात के लिए निंदा होने लगी कि वो पाकिस्तान स्थित इस चरमपंथी का समर्थन कर रहा है जिसका ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी ख़राब रहा है.
लेकिन जब सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध कमेटी मसूद अज़हर के मामले में आम राय नहीं बना सकी तब फ़्रांस ने इस मामले में अगुवाई करते हुए ख़ुद ही मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया. इससे चीन और अलग-थलग पड़ गया.
भारत में इसी साल फ़रवरी में पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले के बाद फ़्रांस, ब्रिटेन और अमरीका ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध कमेटी की मार्च में हुई बैठक में ये प्रस्ताव फिर से रखा. लेकिन चीन ने आख़िरी समय पर एक बार फिर इसपर 'तकनीकी रोक' लगा दी और ये मुद्दा एक बार फिर छह महीने के लिए ठंडे बस्ते में चला गया.
ये चौथी बार था जब चीन ने 'तकनीकी रोक' लगाई थी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति से इस मसले पर और चर्चा करने के लिए कहा था.
लेकिन इसके कुछ ही दिनों के बाद चीन के विदेश मंत्री और भारत में उनके राजदूत इस मुद्दे का जल्द समाधान निकालने की बात करने लगे और छह हफ़्ते के अंदर ही चीन ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी.
इसकी एक वजह ये हो सकती है कि चीन की ओर से बार-बार लगाई जा रही इस तकनीकी रोक को देखते हुए ट्रंप प्रशासन (जिसका चीन के साथ पहले से व्यापार युद्ध चल रहा है) ने पिछले महीने सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर बहस करने का प्रस्ताव दिया था. अमरीका ने कहा था कि ये बहस सुरक्षा परिषद के टेबल पर होनी चाहिए.
अमरीका के इस प्रस्ताव ने चीन को परेशानी में डाल दिया क्योंकि अब चीन को अपना रवैया सार्वजनिक रूप से रखना पड़ता. इससे पहले वो प्रतिबंध समिति की बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में अपनी बात रखता था जिससे ये पता नहीं चल पाता था कि इस मामले में चीन दरअसल क्या कहता था.
इस तरह का दबाव बनता देख पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने ये प्रचार करना शुरू कर दिया कि मसूद अज़हर बहुत बीमार हैं और जबतक उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, तबतक उन्हें कोर्ट में घसीटा नहीं जाना चाहिए.
इसने चीन और पाकिस्तान (ख़ासकर वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई और सेना) को ये सोचने पर भी मजबूर किया होगा कि क्या मसूद अज़हर अब उनके किसी काम के नहीं रहे और क्या वो भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाले हथकंडे के बजाए एक बोझ बन गए हैं.
ये भी दिलचस्प है कि चीन ने ये फ़ैसला ऐसे वक़्त पर किया जब एक दिन पहले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चीन की बेल्ट एंड रोड समिट में हिस्सा लेकर बीजिंग से लौटे थे.
इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत चीन के कई नेताओं से मुलाक़ता की थी. ज़ाहिर है इस दौरान मसूद अज़हर पर भी निश्चित तौर पर बातचीत हुई होगी.
हालांकि चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अपना फैसला तो बता दिया, लेकिन पाकिस्तान को कम से कम नुक़सान हो, इसके लिए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसकी कोई समयसीमा नहीं बताई और अपनी पार्टी लाइन को दोहराते हुए कहा कि जल्द से जल्द इस मसले का उचित समाधान निकाला जाना चाहिए.
चीन की परेशानी को और बढ़ाते हुए पेरिस स्थित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफ़एटीएफ़) ने पिछले एक साल में पाकिस्तान पर नकेल कसते हुए उसे अपनी 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया और उसे जून तक 'काली सूची' में डालने की भी चेतावनी दी. अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वो अपनी धरती पर विभिन्न चरमपंथी संगठनों की आर्थिक फंडिग रोकने में नाकाम रहा है.
चीन फिलहाल एफ़एटीएफ़ का उपाध्यक्ष है और अक्तूबर में अध्यक्ष बनने वाला है. चीन ने अपने फ़ैसले में इस बात का भी ध्यान रखा होगा.
इसके अलावा भारत की हाल में की गई राजनयिक कोशिशें, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आतंकवाद-विरोधी अभियान को भी सराहने की ज़रूरत है, जिसके तहत मोदी चीन समेत सभी महाशक्तियों से सक्रिय द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत के दौरान इस मुद्दे को पुरज़ोर तरीक़े से उठाते रहे हैं.
ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि पिछले अप्रैल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वूहान इनफ़ॉर्मल समिट के दौरान हुई मुलाक़ात में ही इस बात पर सैद्धांतिक तौर पर सहमति बना ली गई थी.
चीन की घोषणा की टाइमिंग से ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरफ़ से मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने का फ़ायदा भारत में हो रहे आम चुनाव में ले सकती है. वो इसे चीन और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी विदेश नीति की बड़ी जीत के तौर पर पेश कर सकती है.
Subscribe to:
Comments (Atom)
مخضرما في صناعة الإعلام، وقد أصدر أكثر من كتاب يتضمن
وقد عَمَد كافيت إلى محاورة ضيوفه والانخراط في نقاشات صريحة معهم، بطئيس الاباحية الجنس & أنيل الجنس جمع الأمريكي، مايك بنس، بزيارة مست...
-
16वीं लोकसभा के बजट सत्र के अंतिम दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने भारतीय राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया. समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिं...
-
Российский сенатор Алексей Пушков прокомментировал заявление президента Украины Владимира Зеленского. Ранее украинский лидер п редложил Рос...
-
وفي العالم العربي أطلق مستخدمو مواقع التواصل الاجتماعي وسم #فيروس_هانتا والذي كان من ضمن أكثر الوسوم انتشارًا في عدد من الدول منها: الجزائ...